यह गहन पत्र, प्रसिद्ध गुजराती लेखक स्वर्गीय अश्विनीभाई भट्ट द्वारा गुजराती में लिखा गया, व्यापक पाठकवर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से उनके पुत्र नील भट्ट द्वारा मुझे साझा किया गया है। इसे शैक्षणिक अध्ययन और ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से ‘फेयर यूज़’ के सिद्धांत के अंतर्गत साझा किया गया है। यह पत्र वर्ष 1991 में अभियान पत्रिका में प्रकाशित हुआ था, जिसकी छवियाँ यहाँ साझा की गई हैं और पत्रिका को समुचित श्रेय दिया जाता है।
अश्विनीभाई गुजरात के सबसे लोकप्रिय उपन्यासकारों में से एक थे, अत्यंत प्रिय और व्यापक रूप से पढ़े जाने वाले कॉलमनिस्ट और लेखक थे। उन्होंने यह पत्र नर्मदा नदी पर बने बड़े बांध, सरदार सरोवर परियोजना (एसएसपी) के कारण आदिवासियों के विस्थापन के मुद्दे पर लिखा था। यह पत्र अभियान पत्रिका के संपादकों को संबोधित था, जो उस समय की एक व्यापक रूप से पढ़ी जाने वाली पत्रिका थी।
धारा के विपरीत चलते हुए, अश्विनीभाई ने इस बांध को चुनौती दी और अपनी लोकप्रियता को दांव पर लगा दिया—ऐसे राज्य में, जहाँ इस परियोजना के खिलाफ ज़रा-सी आवाज़ उठाने वालों को भी सहन नहीं किया जाता था, और जिसे गुजरात की जीवनरेखा घोषित कर दिया गया था। यह निरंतर प्रचार कि केवल सरदार सरोवर परियोजना ही राज्य के जल संकट का समाधान कर सकती है, जनमत को इतनी गहराई से प्रभावित कर चुका था कि गुजरात के कई प्रमुख सार्वजनिक व्यक्तित्व—जिनमें से कई बड़े बांधों में विश्वास भी नहीं रखते थे—भी इस पर सवाल उठाने का साहस नहीं कर सके।
ऐसे समय में, अश्विनीभाई—एक अत्यंत प्रिय और सम्मानित लेखक—का यह पत्र नर्मदा घाटी के लोगों और नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा खुले दिल से स्वीकार किया गया। यह विशेष रूप से गुजरात में काम कर रहे आंदोलन के कार्यकर्ताओं के लिए अत्यंत आवश्यक संबल (ऑक्सीजन) साबित हुआ।
अब इस पत्र के प्रथम प्रकाशन को 35 वर्ष हो चुके हैं। हाल ही में, अश्विनीभाई के पुत्र नील भट्ट ने इसे बहुत उदारतापूर्वक मेरे साथ साझा किया और अश्विनीभाई की पत्नी, नीतिबहन ने इसका अनुवाद किया ताकि इसे व्यापक पाठकवर्ग तक समझ और ज्ञान के उद्देश्य से पहुँचाया जा सके। मैं एक बार फिर अभियान पत्रिका का आभार व्यक्त करती हूँ, जिसने इस पत्र को प्रकाशित किया था, और मैं इसे यहाँ केवल शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए साझा कर रही हूँ।
मैं अश्विनीभाई—एक असाधारण इंसान, जिन्हें निकट से जानने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ—की इस अमूल्य रचना को यहाँ पुनः प्रस्तुत कर रही हूँ- नीतिबहन द्वारा हिंदी अनुवाद नीचे दिया गया है और अभियान पत्रिका के फोटो पृष्ठों के अंत में संलग्न किया गया है।
अहमदाबाद
दिनांक 6 मई 1991
प्रिय शीला बहन, प्रिय कान्ति भाई, प्रिय केतन भाई,
बामणी गाँव की पथरीली ढलान उतरते मैं “फूट फूटकर रो पड़ा था…” अश्विनी भट्ट
नर्मदा किनारे एक आदिवासी गाँव की मुलाकात…
आज जब पूरे देश में कुर्सियों की खींचतान में विभिन्न राजनीतिक दल मशगूल हो, नेता, साधु, अवसरवादी, तस्कर और डाकु ओझा की तरह अपने अपने ढोल पीट रहे हों, जब हतप्रभ देशवासियों की स्थिति कौरव सभा में खड़ी द्रौपदी सी हो गई हो, जब गांधीवादी कहे जानेवाले संगठन भी गांधी को गिरवी रखकर अपनी रोटी कहाँ सिकेगी इसकी गिनती लगाकर राजकीय जोड़तोड़ में लगे हों, जब मूल्यों को पूरी तरह अवहेलना की चुकी हो, ऐसे में किसी अनुशासित, मूल्यनिष्ठ, स्वयंभू जनआंदोलन की बात करना ढोल नगारों के शोर में होंठ हिलाने की तरह हैं। फिर भी ४ और ५ मई के दिन नर्मदा घाटी के बामणी गाँव में हुए एक आदिवासी सम्मेलन की बात किये बिना नहीं रह सकता।
नर्मदा आंदोलन चल रहा है। बाँध होना चाहिए या नहीं, उससे आदिवासियों को और गुजरात को क्या नुकसान होगा या उसमे किन किन राजनीतिक और आर्थिक हितों की खिचड़ी पकने वाली है – इन प्रशनों पर चर्चा नहीं करना चाहता। मैं केवल यह कहना चाहूँगा जो अनुशासन, जो निष्ठा, जो समझ एक जनआंदोलन में जरूरी है उसका एक परिचय लोगों को मिले इसलिये यह खत आपको भेज रहा हूँ।
नर्मदा बाँध हो या न हो लेकिन इन सामान्य अनपढ़ और गरीबी, पीढ़ियों से शोषित इन आदिवासियों के सम्मेलन में मैंने गांधी को, गांधी की परंपरा को, गांधी की निष्ठा और अनुशासन को पुनर्जीवित होते देखा।
“दिनांक 4 और 5 को हम नर्मदा समर्पण सम्मेलन आयोजित कर रहे हैं और इस सम्मेलन को हम दिवाली की तरह मनायेंगे…” इस तरह का निमंत्रण मुझे नर्मदा घाटी के गाँव से मिला। नाटक और लोकनाट्य में यूँ भी मेरी रुचि है और नर्मदा विवाद में भी मेरी दिलचस्पी है, इसलिये इस निमंत्रण पाकर मुझे खुशी हुई। इसके अलावा ओथार उपन्यास की वजह से भी नर्मदा के प्रति मेरी अनहद चाह मुझे सदैव उसके किनारे खींच लाती है। सम्मेलन 4 तारीख को शाम को 6:30 पर शुरू होनेवाला था।
साबरकांठा से पंचमहाल जिल्लों में आदिवासी क्षेत्रों में कार्य करते श्री मधुसूदन मिस्त्री जी किराये की जीप लेकर आये थे। सुबह 6 बजे हम अहमदाबाद से निकले और दोपहर 2 बजे गधेर गाँव पहुँचे। वहाँ से ऊँचे टीलों पर जीप नहीं जा सकती थी और हमें पैदल चलना पड़ा। गधेर के आगे नर्मदा किनारे करीबन सौ–सौ फुट ऊँचे रेत के टीले हैं। अगर नदी किनारा ना हो तो तुम्हें बाड़मेर या जैसलमेर के रेगिस्तान की याद दिला दें। वहाँ से नीचे उतरने पर विशाल पत्थरों के बीच बहती नर्मदा के निर्मल पानी का अस्खलित प्रवाह तुम्हारे मन को मोह लेगा। बेहद गर्मी से तंग हमने छोटे बच्चों की तरह नदी में स्नान किया और सामने किनारे पहुँचे। ऐसी ही भयानक गर्मी में रेत के टीले चढ़कर हम बामणी गाँव की ओर बढ़े। पहाड़, चट्टानें, नदी का पथरीला पाट, प्रकृति का सुंदर स्वरूप देखते बढ़ते रहे लेकिन गर्मी इतनी भयानक थी, लगता था चक्कर खाकर गिर पड़ेंगे। आखिर शाम को ५ बजे बामणी गाँव पहुँचे।
सैकड़ों आदिवासी आ गये थे और आ रहे थे। यहाँ भी करीबन ३०० फुट चढ़ाई कर थककर बेहाल हालत में हम आ पहुँचे। सम्मेलन रायन फलिया में था। (जहाँ से सैकड़ों रायन के पेड़ ठेकेदारों ने काट डाले है।) स्वागत के लिये ऊपर एक छोटी सी झोपड़ी बनाई गई थी जो प्लास्टिक और अनाज के थैलों से बनी थी।
स्वागत समिति के आदिवासी कार्यकर्ता हमें आते देख पानी के घड़े लिये खड़े थे। झोपड़ी में कुछ आराम कर हमें शामियाने में ले जाया गया जो अनाज के थैलों से बना था। वहाँ पूरे विस्तार में कहीं भी बिजली नहीं थी। सूर्यास्त के साथ अँधेरा हो चुका था। हमारे लिये चाय बनाई गई और हमें मेधा पाटकर और उनके साथियों की झोपड़ी में ले जाया गया।
अंदर सन्नाटा छाया हुआ था।
मेधाबेन से हम परिचित थे। हमें देखकर उन्होंने आनंद व्यक्त किया भी लेकिन उसमें कोई ऊष्मा के बदले आँखों में पानी भर आया। “अश्विनीभाई, आप इतना कष्ट उठाकर हम आदिवासियों के पर्व में शामिल होने आये हैं, पर अब समझ नहीं आता कि आज क्या होगा…” कहकर मेधाबेन ने साढ़े चार–पाँच बजे हुई दुर्घटना की बात बताई। यू.एन.आई. के युवा प्रतिनिधि मानस स्कारिया करीबन 4.30 से 5 के बीच नर्मदा में स्नान करने गये थे। उन्हें पता नहीं मन में क्या आया कि अचानक तैरकर सामने किनारे जाने की सूझी और पानी में कूद पड़े। नर्मदा की धारा बहोत तेज थी और पानी काफी गहरा। कई जगह पर दस बाँसों से भी गहरी और कई सौ सौ फुट गहरी चट्टानों पर की धारा है। स्कारिया कुशल तैराक थे। पहने हुए कपड़ों के साथ वे कूद पड़े और तीन सौ फुट से भी अधिक चौड़े इस जल प्रवाह को पार कर सामने किनारे पहुँचने का प्रयास करने लगे। उनके साथ दो महिलाएं और एक व्यक्ति भी आये थे। मानसभाई सामने किनारे पहुँचने पर थे कि शायद थक गये होंगे या हिम्मत हार गये हों, जो भी हो वे डूबने लगे।
उन्होंने शायद चिल्लाने की कोशिश की हो। इस ओर बैठी महिलाएँ कुछ समझ पायें इसके पहले ही पानी में नीचे डूब गये। सामने किनारे कुछ नाविक मौजूद थे पर जब तक उन्हें पुकारकर सचेत किया जाता वे डूब चुके थे। इसके अलावा जहाँ सम्मेलन था, वहाँ से पहुँचने में कम से कम पन्द्रह मिनट लग जाते। कुछ नाविक पानी में कूद पड़े। उनमें से एक ने ऊपर आकर यह खबर पहुंचाई।
सम्मेलन में आये तीस चालीस आदिवासी नीचे नदी तक दौड़े थे। वे पानी में कूदकर भारी खोज में जुट गये थे। जब हम वहाँ पहुँचे तब भी खोज जारी थी। सभी हताश हो रहे थे। मशालें जलायी जा चुकी थी और चारों दिशाओं में पानी में खोज की जा रही थी। ऊपर सैकड़ों आदिवासी प्रतीक्षा कर रहे थे।
सम्मलेन में दो मुख्य कार्यक्रम तय थे। पहले एक बैठक होना थी। बैठक के बाद ढोल प्रतियोगिता, गीतों और नृत्य का आयोजन था। मुर्गे की पहली बांग पर नर्मदा आंदोलन पर आधारित दो फिल्में दिखाई जानी थीं। इसके बाद एक जुलूस निकलना था और लोग नर्मदा नदी में उतरकर आत्मबलिदान की प्रतिज्ञा लेने वाले थे।
संघर्ष समिति के आदिवासी विचार विमर्श कर रहे थे कि यु एन आई के प्रतिनिधि मानस चार घंटे से मिले नहीं थे। क्या वे डूब गये होंगे? ऐसे में हम यह उत्सव कैसे मना सकते हैं? उत्सव शुरू होने का समय बीत गया था। बड़े उत्साह के साथ लोग नर्मदा किनारे बसे कई गाँवों से- पच्चीस तीस यहाँ तक कि चालीस किलोमीटर की दूरी तय करके यहाँ पहुँचे थे। वे अपने ढोल और नृत्य के लिये उनके पास जो भी वस्त्र थे पहनकर आये थे। माहौल दीपावली के उत्सव जैसा था और गाँव गाँव से युवाओं के समूह यहाँ इकट्ठे हुए थे।
बामणी गाँव की पूरी बस्ती (करीबन 400) के अलावा आसपास के गाँवों — सिंधुरी, मुखड़ी, गधेर, माकड़खेड़ा आदि से भी दर्शक आये हुए थे। निमाड़ और अलीराजपुर जैसे क्षेत्रों से भी युवा आदिवासी भाई बहन आ पहुँचे थे। दिल्ली, पूर्वी उत्तर प्रदेश, उत्तर पूर्वी क्षेत्रों, बिहार और उड़ीसा के कार्यकर्ता भी आये हुए थे जो आदिवासी लोगों में काम करनेवाले आंदोलनकारी थे। अतिथि भी आ पहुँचे थे। इसी बीच यह करुण घटना बनी। इसे सुनकर उन्हें भी गहरा सदमा लगा।
करीबन नौ बजे तक मानस स्कारिया की खोज पूरी तरह निराशाजनक हो चुकी थी। तब सम्मेलन समिति ने निर्णय लिया कि केवल सभा आयोजित की जाएगी। आंदोलन का एक गीत गाया जायेगा और सुबह का प्रतिज्ञा कार्यक्रम पहेले की तरह जारी रहेगा। नृत्य और संगीत के कार्यक्रम स्थगित किये जायेंगे। यह घोषणा की गई और उपस्थित लोगों से पूछा गया कि क्या वे इस निर्णय से सहमत हैं? सभी ने अपनी सहमति व्यक्त करते हुए हाथ उठाए।
सभा का संचालन एक आदिवासी नेता केवलसिंग ने किया। अधिकांश वक्ता आदिवासी ही थे। मेधाबेन श्रोताओं के बीच बैठी थीं। पूरी सभा का संचालन जिसमें अगला वक्ता कौन है इसकी घोषणा आदिवासी भिलाला बोली में की गई। भिलाली तीन भाषा — हिंदी, मराठी और गुजराती के मिश्रण की बोली है जिसमें गजब की मिठास है। सभा की शुरुआत स्कारिया के लिये प्रार्थना से हुई और अब भी तलाश जारी है की घोषणा की गई। बाद में आंदोलन का एक गीत गाया गया और बाद में नर्मदा आंदोलन के विभिन्न पहलुओं पर आदिवासी कार्यकर्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किये। उसके बाद देशभर से आये अतिथियों ने भाषण दिए और अरुंधती धुरु ने उनके शब्दों का भिलाली अनुवाद किया।
प्रभावित करने वाली बात यह थी कि हमारे अखबारों, जो खुद बिक गए है, इनके समाचार लेने पर भी हिचकिचाते हैं। फिर भी एक प्रकार की आकस्मिक मृत्यु की वजह से दिवाली जैसे एक महत्व के उत्सव को स्वयंभू बंद करने का निर्णय लिया गया। वह उत्सव उनके लिए किसी दीपावली से कम नहीं था। यह कोई छोटी बात नहीं थी। पूरे कार्यक्रम के दौरान जिस असाधारण अनुशासन का परिचय दिया गया, वह भी उतना ही उल्लेखनीय था।
बड़ी-बड़ी संस्थायें चलाने वाले और सरकारी पैसों से सेवा कर रहे आज के गाँधीवादी और संगठनों को नये ढंग से इस बात को समझना जरूरी है। गुजरात के समृद्ध लोगों को इसका दृष्टांत लेना जरूरी है। अपने घर से आदिवासी, मक्का, दाल और प्याज लेकर आये थे। दुसरे गाँवों से आये 400 लोगों को भोजन कराया गया पर आसपास के गाँव के लोग इनमें शामिल नहीं थे। बामणी गाँव की बहनों और भाई जो रसोई कमेटी में थे उन्होंने भी भोजन नहीं किया। निमाड़ से आई थककर चूर हो गयी
बहनों ने भी खाना नहीं खाया और कहा ‘हम तभी खायेंगे जब बह गया व्यक्ति मिल जाता हैं’।
यह समझ यह भाव सिखाने से नहीं आती – भीतर ही से (अंतर से) उत्पन्न होती है।
गुजरात में एक ऐसा वर्ग है जो किटी पार्टियाँ आयोजित कर सकता है, क्लबों में जा सकता है, शेयर बाजार और रेसकोर्स में लाखों रुपयों की लेनदेन कर सकता है। एयर कंडीशन कमरों में रहता है। फाइव स्टार होटलों में भोजन लेता है। ऐसे आरामदायक जीवन जीने वाले लोग, और यहाँ तक कि हमारे मध्यवर्ग के कई लोग अपनी ‘सुख’ की कल्पना की नींव को झकझोर दे- ऐसी स्थिति में जीते लोगों के जनआंदोलन की उपेक्षा करते हैं! यह बात, या तो हमारी लापरवाही, अनैतिकता या केवल भय है?
जहाँ बिजली नहीं है, जहाँ वाहन पहुँच नहीं पाते, जहाँ ना तो बाजार है, ना ही दुकानें… वहाँ एक आंदोलन चल रहा है। एक ऐसा आंदोलन जिसका मूल प्रश्न अस्तित्व का और जड़ों का है। जहाँ कोई साधन नहीं, जहाँ अपनी आवाज़ उठाने तीस-बीस किलोमीटर दूर तक पैदल चलना पड़ता है। जहाँ फूलगोभी की सब्जी नहीं मिलती और न ही पावभाजी के ठेले हैं। यहाँ तक कि धातूओं के बर्तन भी नहीं। फिर भी वहां एक समाज जी रहा है, अपनी गरीबी में, अपने माहौल में। मक्के की रोटी और दाल या जंगल में होने वाली दो-चार चीजें खाकर जी रहा है।
उन्हें हमसे कोई शिकायत नहीं है। हम जो एयर कंडीशन मकानों में रहते हैं, मारुति कार चलाते हैं, पार्टियों में जाते हैं, बढ़िया सूट या साड़ियाँ पहनते हैं, पावर शूज़ या रेब्रांड के चश्मे पहनते हैं, बाज़ार में सट्टा लगाते हैं, इसकी हमसे उन्हें कोई शिकायत नहीं। उनके आसपास कुछ पहाड़ियाँ हैं, कुछ बचे हुए पेड़ और जंगल, नर्मदा जैसी नदी और जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा। वही वे अपने हाथों से कुदाली से जमीन से पत्थर निकालकर मक्का की खेती करते हैं। वे जंगल से उपलब्ध चीजें इकट्ठआ कर बेचते हैं। बाज़ार से गमछा या पत्नी के लिये कपड़े खरीदते हैं। उन्हें परदेशी- कीमती वस्त्रों की ज़रूरत नहीं। फिर हम क्यों उनसे कतराते हैं? किसलिये हम उनकी निजी जिंदगी में ‘विकास’ के नाम पर दखलअंदाज़ी कर रहे हैं? हम किसलिये उन्हें अपना दुश्मन मानते हैं? किसके विकास के लिये, कैसा विकास?
एक आदिवासी ने बड़े पते की बात कही। (शायद उसे पता नहीं कि शहरों का व्यवहार कौन और कैसे चलाता है।) हमारा जीवन तीन मालिकों पर निर्भर है। चार महीने गर्मी में पानी हमें मछली देता है। चार महीने जंगल सहारा देता है। तब हमें लाख, गोंद, लकड़ी, फल, जामुन, हरड़, आंवला वगैरह हमें मिलता है और चार महीने हमें जमीन जीवन देती है जहाँ हमें मक्का मिलता है। यह तीन चीजें—जंगल, जमीन और पानी—क्यों उनसे छीन रहे हो, किसलिये?
बामणी गाँव जो नर्मदा नदी के पट से करीबन 200 फीट ऊपर स्थित है, अपने आसपास के पूरे क्षेत्र के साथ आज नहीं तो कल डूब जायेगा। एक लकड़हारे को सोने की कुल्हाड़ी देने का क्या मतलब होगा? जो आदिवासी अनादि काल से इस भूमि पर रहते आये हैं, उन्हें अपनी ही धरती से बिछड़ना होगा जैसे किसी नन्हे मासूम बच्चे को माँ की छाती से खींच लिया हो।
खैर.. हमारा आज का वाचकवर्ग आज तक जिस तरह के वाचन से परिचित है या कई समायिको उन्हें जो दिया है उससे कुछ अलग, प्रेरणादायी, कुछ आत्मसंशोधन करने का वाचन हम दे सके इसलिये यह पत्र लिख रहा हूँ। शरद पवार या मुकेश अंबानी के भव्य विवाह भोज, बड़े होटलों की अनूठी कहानियाँ, भ्रष्ट राजनेताओं के अड़ंबर या असामाजिक घटनाओं के वृतांत- शायद यह महत्त्व की वाचन सामग्री हो सकती है। फिर भी वे एक जनआंदोलन से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं हैं जो समुदाय के अस्तित्व से जुड़ा हो।
गुजरात की समृद्ध महिलाएँ और समृद्ध पुरुषों जिन्हें अपने परिवार या व्यवसाय के अलावा कुछ भी सोचने का समय नहीं या परवाह नहीं उनकी चेतना को हल्के से झकझोर दे, उन्हें जागृत कर बता सके कि कही (मुख्यधारा) संस्कृति से दूर एक आंदोलन चल रहा है जहाँ ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस’ से M.A. करनेवाली अरुंधती आदिवासियों के बीच रहती है, भिलाली भाषा बोलती है और इस धरती पर आदिवासियों की तरह जीती है। जहाँ भावनगर की नंदिनी ओझा, महाराजा सयाजीराव बड़ौदा यूनिवर्सिटी से एम.एस. डब्लू. करने के बाद गाँव की महिला की तरह नर्मदा का पानी सिर पर उठाकर 250 फुट ऊँची पहाड़ी चढ़ती हैं।
जहाँ श्रीपाद जो Indian Institute of Technology से शिक्षित हैं, और लखनऊ के आलोक अग्रवाल, शिक्षक सागर [संजय] सांगवई, तथा संध्या, नवा और मोंगो जैसे आदिवासी साथी—सभी आदिवासियों के साथ उन्हीं की तरह रहते और काम करते हैं। जहाँ सूरत की युवा आदिवासी महिला भद्राबेन गीतों के लिए नई-नई धुनें रचती हैं। और जहाँ निमाड़ की शांता बेन यादव बोलते-बोलते ही ऐसी अद्भुत कविताएँ रच देती हैं कि उनकी तत्क्षण काव्य-रचना की गति और प्रतिभा गुजरात के स्थापित कवियों को भी चुनौती दे सकती है। जहाँ बंबई, अहमदाबाद, बड़ौदा जैसे शहरों में महंगे पारिधानों में नृत्य करनेवाली कन्याओं को भी चकित कर दे इस लय से ये आदिवासी कन्याएँ रात भर नृत्य करती हैं। बिना किसी स्वस्थ्य केन्द्रों में जाये बिना यहाँ स्त्रियों की कटि कमर ‘गरवी गुजरातण’, कहलाती समृद्ध स्त्रियों से ज्यादा खूबसूरत होती है।
इन आदिवासियों के पास साधन नहीं, कोई धन नहीं, मोटर गाड़ियों के काफिले नहीं। इनके नेताओं के पास घर गाँवों में पहुँचने हेलीकॉप्टर नहीं। उनके सामने गुजरात की सरकार खड़ी है, पुलिस खड़ी है। कहलाते गांधीवादी भी खड़े हैं। मंडल आयोग के नाम पर दलित वोट के लिये वी. पी. सिंह खड़े हैं, राष्ट्रीय स्वयं सेवा संघ खडा हैं। चालीस वर्षों से गरीबी हटाने के नारे लगानेवाली कांग्रेस के नेता खड़े है जिनके करोड़ों रुपये स्विस बैंक में जमा हो रहे हैं। सच्चीदानंद जैसे साधु और चुन्नी काका और दर्शक जैसे समाजसेवी लोग भी खड़े हैं। भारतभर में पदयात्रा का यशोगान करते चंद्रशेखर खड़े हैं। मुस्लिम या अन्य अल्पसंख्यक समुदाय की बात करनेवाले नेता और आंदोलन करनेवालों ये आदिवासी को अल्पसंख्यक नहीं मानते। राम जन्मभूमि के रक्षकों को नर्मदा के किनारे कितने हिन्दू मंदिर जलसमाधि लेंगे इसकी इन्हें परवाह नहीं है। साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती या विश्व हिन्दू परिषद के लिये केवल राममंदिर ही पवित्र है – प्रतीत होता है। अन्य मंदिर विकास के नाम पर डूब जायें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और जो नेता यह कहते हों कि बाबरी मस्जिद किसी कीमत पर हटाना नहीं चाहिए, वे जानते नहीं कि नर्मदा किनारे असंख्य मंदिर हैं जो बाबरी से भी पुराने हैं, पानी में डूब जायेंगे।
ऐसा क्यों? क्योंकि आदिवासी गरीब हैं, अशिक्षित हैं और निःसहाय हैं। क्योंकि चिमनभाई जैसे नेता और सरकारों के पास सत्ता है, ताकत है। क्योंकि गुजरात के लोग इस बारे में उदासीन हैं। क्योंकि हम आदिवासी जीवन के बारे में कुछ जानते नहीं। क्योंकि आदिवासी पैर टूटे हुए हिरन की तरह हैं। गिद्धों के लिये आसान शिकार हैं।
लेकिन जहाँ क्रोध हथियारों से व्यक्त होता है, वहाँ बातचीत समझौते के साथ होती है। और जहाँ आंदोलनों विदेशी धन, हथियार और परदेशी एजेंटो द्वारा होते हैं, जहाँ हर रोज़ निर्दोष लोगों की हत्याएँ होती हैं, वहाँ करोड़ों घूस या परियोजना आदि, देने पड़ते हैं। वहाँ कोई चिमनभाई पटेल नहीं होता जो सरकारी खर्चे पर रैलियाँ निकालकर आतंकवादियों को खदेड़ सके।
खैर! मैं यह पत्र इसलिए लिख रहा हूँ कि बताया जा सके, एक जागृत आंदोलन यहाँ चल रहा है। स्वयंभू रीति से विकसित हो रहा है। एक पत्रकार ने यह आरोप लगाया था कि नर्मदा बचाओ आंदोलन को परदेश से पैसे मिलते हैं। बात यह है अगर ऐसा होता तो किसी भी ताकतवर मुख्यमंत्री आसानी से गिरा दिया जाता। आखिर धन की शक्ति क्या है यह शायद यह पत्रकार भी जानते हैं। इसके अलावा जो सरकार पूरा देश और अपनी योजनाएँ परदेशी धन के बिना चला नहीं सकती वे तो मानेंगे ही – और परदेशी धन तो ठीक है, परदेशी कागज के बिना जिस देश में अखबार निकाल नहीं सकते- वे कैसे समझेंगे कि एक स्वाभाविक जन आंदोलन क्या होता है।
मैं यह ख़त इसलिए लिख रहा हूँ कि हम समझें कि जनआंदोलन वास्तव में क्या होता है। यह स्वयंभू अनुशासन, मानव अधिकार और अस्तित्व के लिये प्राकृतिक संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारे को समझने का, विकास को पुनर्परिभाषित करने का, जल के प्रश्नों पर विचार-विमर्श, जमीन संरक्षण और कृषि-वनीकरण की संभावनाओं को तलाशने का मौका गुजरात के सामने है। आज के लिये गए निर्णय केवल आदिवासियों को ही नहीं, पूरे गुजरात को प्रभावित करेंगे। तब कम से कम ‘अभियान’ पत्रिका के पाठक आत्मनिर्णय कर सकें। ऐसी सामग्री देकर हम सच्चे अखबार का कर्तव्य निभा सकें।
मैं पाठकों का आह्वान करता हूँ कि नर्मदा प्रश्न पर केवल अखबारों पर आधारित न रहकर, गहराई से इन समस्याओं का अध्ययन करें और योग्य अभिप्राय व्यक्त करें। मैं हर तरह से मदद करने तैयार हूँ।
बामणी गाँव के इस आयोजन में कुछ अन्य घटनाएँ भी बनी थी। सम्मेलन में अपेक्षा से कहीं अधिक लोग आ गये थे। ऐसे तो सबसे कहा गया था कि बिछाने के लिये अपने साथ कुछ लेकर आयें लेकिन मेरे जैसे कुछ लोग बिना कुछ लिये आ गये थे। तुरंत उपाय निकाला गया और शामियाने की छत के लिये जो प्लास्टिक जोड़ा गया था उसे उतारकर सोने के लिये बिछाया गया। मैं सबसे मिला था। नीचे पानी को लाने की व्यवस्था, बिछाने की व्यवस्था, रसोई में मक्के का आटा और दाल की व्यवस्था के बारे में पूछता रहा। एक-एक जवाबों से मैं दंग रह गया। फिर भी सुबह निकलने से पहले अरुंधती को बुलाकर पूछा—
“आपको रोजमर्रा जरूरतों के लिये क्या चाहिये? मैं और मेरे दोस्त मदद कर सकते हैं। क्या आप मुझे एक सूची दे सकती हो?”
उसने तुरंत कहा, “हमें लोग चाहिये।”
“यह तो मेरी क्षमता के बाहर है,” मैंने कहा, “लेकिन आप सूची दो तो…”
पास ही आलोक अग्रवाल बैठे थे। रसोई समिति की आदिवासी महिला लुकु और उसके पति संध्या भी थे।
“अच्छा, जब आप इतना जोर दे रहे हैं तो हमें दवाइयाँ चाहिये। एक डॉक्टर चाहिये। एक जनरेटर चाहिये। एक जीप चाहिये। मोटर साइकिल भी चलेगी। हमें पैदल चलने पर आपत्ति नहीं है लेकिन हर जगह हम पहुँच नहीं पाते और सबसे अधिक हमें स्टेशनरी की जरूरत है और कागज़ छपाई की व्यवस्था चाहिये। हम एक समाचार पत्रिका निकालते है। पूरी तरह हस्तलिखित। उसकी प्रतियाँ हाथ से बनाई जाती है। परिपत्र पोस्टर सबकुछ हाथ ही से लिखा जाता है। बंबई के कुछ लोग स्वेच्छा से छपाई कर देते है। गुजरात के कई संगठन अपने आप हमारा साहित्य छापते हैं। शीलाबेन के लेख की क़रीबन एक लाख प्रतियाँ अलग-अलग संगठनों ने छापी। फिर भी हमें छपाई के लिये कागज़ चाहिये।”
“और कुछ?” मैंने पूछा।
“और क्या चाहिये?” उसने मुस्कुराते कहा। पास बैठी लुकु भी मुस्कुराई। उसने भिलाली भाषा में कुछ कहा और उसे रोकते हुए उसके पति ने कुछ कहा।
मैंने अरुंधती से पूछा, “उसने क्या कहा?”
अरुंधती ने कहा, “वह हमारी सबसे जुझारू कार्यकर्ता है।”
“लेकिन उसने कहा क्या?” मैंने आग्रह से पूछा।
अरुंधती ने कहा, “अगर बाँध नहीं रुका, तो बामणी डूब जायेगा। फिर हमें क्या चाहिये होगा? अगर आप कुछ देना ही चाहते हो तो एक वादा करो। जब बामणी डूबेगा तो मैं भी डूब जाऊँगी। मेरा पति भी डूब जायेगा। मेरी छोटी राजू भी डूब जायेगी… तब किसी दिन अपने बच्चों को बताना, देखो यहाँ एक गाँव था, यहाँ एक औरत थी लुकु… उसका पति था… उसकी छोटी बेटी थी… और लुकु ने मुझे मक्के की रोटियाँ खिलाती थी…”।
मैं स्तब्ध रह गया।
यदि ऐसा हुआ तो मेरे छाती फट जायेगी। एक पुरुष होने के तौर पर अपनी आँखों में आई नमी को छिपाये रखा लेकिन बामणी गाँव के खड़कीले ढलान से उतरते मैं फूट-फूट कर रो पड़ा था…
— सस्नेह, अश्विनी भट



